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July to September 2026 Article ID: NSS10005 Impact Factor:8.05 Cite Score:3 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य : विकास, प्रवृत्तियाँ एवं सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना
कविता
शोधार्थी, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)डॉ. भावना
शोध निर्देशिका, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)
शोध सारांश - स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य भारतीय
समाज के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों का
सशक्त साहित्यिक दस्तावेज है। वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय
समाज ने जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था, औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा आधुनिक शिक्षा के
माध्यम से नवीन संभावनाओं का अनुभव किया, वहीं विभाजन की त्रासदी, विस्थापन,
आर्थिक विषमता, बेरोजगारी, सामाजिक रूढ़ियों और मानवीय संबंधों में बढ़ती जटिलताओं
जैसी समस्याओं का भी सामना किया। इन परिस्थितियों ने हिंदी कथा साहित्य की
विषयवस्तु, संवेदना और शिल्प को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
स्वातंत्र्योत्तर
हिंदी कहानी और उपन्यास में व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष, अस्तित्वगत संकट,
मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं, ग्रामीण समाज के विघटन, स्त्री की अस्मिता, जातिगत
भेदभाव तथा राजनीतिक-सामाजिक विसंगतियों को प्रमुखता प्राप्त हुई। प्रेमचंद की
सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हिंदी कथा साहित्य ने नई कहानी
आंदोलन, सचेतन कहानी, समानांतर कहानी, जनवादी कहानी तथा समकालीन विमर्शों के
माध्यम से विविध रूप ग्रहण किए। जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, यशपाल, फणीश्वरनाथ रेणु,
मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती,
भीष्म साहनी, उदय प्रकाश तथा दलित एवं स्त्री कथाकारों ने इस विकास में
महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य की
प्रमुख प्रवृत्तियों, विकास-क्रम, प्रतिनिधि रचनाकारों और सामाजिक प्रासंगिकता का
विश्लेषण करना है। अध्ययन में ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय, तुलनात्मक तथा
मनोवैज्ञानिक दृष्टियों का उपयोग किया गया है।
