• July to September 2026 Article ID: NSS10013 Impact Factor:8.05 Cite Score:42 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    पद्म पुराणीय जल-तीर्थ: समकालीन पर्यावरणीय प्रासंगिकता

      सुरेश कुमार मीणा
        शोधार्थी (संस्कृत) मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)

शोध सारांश-  भारतीय संस्कृति में पुराण केवल धार्मिक आख्यान न होकर प्रागैतिहासिक एवं ऐतिहासिक काल के पारिस्थितिकीय कोष हैं। अष्टादश महापुराणों में वैष्णव परम्परा का प्रमुख ग्रन्थ पद्म पुराण जल-संरक्षण, वनीकरण, मृदा संरक्षण तथा नदियों-जलाशयों की स्वच्छता को धर्म तथा मोक्ष से जोड़कर प्रस्तुत करता है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर गहराते जल-संकट, नदियों के प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन जैसी पारिस्थितिकीय चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में पद्म पुराण में प्रतिपादित ‘तीर्थ-अवधारणा’ केवल आध्यात्मिक न होकर जल-पारिस्थितिकी के संरक्षण की एक सुदृढ़ व्यावहारिक नीति प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत शोध पत्र पद्म पुराण के विभिन्न खण्डों में वर्णित नदी एवं जलाशय तीर्थों के पौराणिक साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए उनकी समकालीन पर्यावरणीय प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।

शब्द कुंजी- पद्म पुराण, जल-तीर्थ, पारिस्थितिकी तन्त्र, जल-संरक्षण, पूर्त धर्म तथा समकालीन प्रासंगिकता।