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July to September 2026 Article ID: NSS10016 Impact Factor:8.05 Cite Score:22 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
गोंड जनजातियों में प्रचलित तीज-त्योहारों का सांस्कृतिक महत्व
नरेन्द्र कुमार भारद्वाज
शोधार्थी (इतिहास) डॉ. सी. व्ही. रमन विश्वविद्यालय, करगीरोड, कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)डॉ. मंजू साहू
शोध निर्देशिका (इतिहास) डॉ. सी. व्ही. रमन विश्वविद्यालय, करगीरोड, कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)
शोध सारांश-भारत
की जनजातीय परंपराएँ देश की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिनमें
गोंड जनजाति की सांस्कृतिक विरासत विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह अध्ययन गोंड
समुदाय में प्रचलित प्रमुख तीज-त्योहारोंकृजैसे मड़ई, करमा, पोला
तथा नवा खानीकृके सांस्कृतिक,
सामाजिक,
धार्मिक एवं पारिस्थितिक महत्व का विश्लेषण करता है। शोध का उद्देश्य यह समझना
है कि ये त्योहार किस प्रकार गोंड समाज की सामूहिक पहचान, पारंपरिक
ज्ञान और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को सुदृढ़ करते हैं। अध्ययन में
वर्णनात्मक शोध पद्धति का उपयोग किया गया है, जिसमें
द्वितीयक स्रोतों- जैसे पुस्तकों,
शोध-पत्रों एवं सरकारी रिपोर्टों- के साथ-साथ संदर्भित जनजातीय अध्ययनों का
विश्लेषण शामिल है। निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि गोंड जनजाति के त्योहार केवल
धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं,
बल्कि वे सामाजिक एकता को प्रोत्साहित करते हैं, सांस्कृतिक
मूल्यों को संरक्षित रखते हैं और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित
करते हैं। उदाहरणस्वरूप,
करमा उत्सव वृक्ष-पूजा के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है, जबकि
नवा खानी कृषि चक्र और आभार व्यक्त करने की परंपरा को दर्शाता है। आधुनिकता, शहरीकरण
और वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण इन पारंपरिक उत्सवों में कुछ परिवर्तन अवश्य आए
हैं, फिर
भी ये त्योहार गोंड समाज की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका
निभा रहे हैं। अध्ययन यह सुझाव देता है कि इन परंपराओं के संरक्षण हेतु शैक्षिक, सामाजिक
एवं नीतिगत स्तर पर विशेष प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि यह
सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।
शब्द कुंजी-गोंड जनजाति, तीज-त्योहार, संस्कृति, परंपरा, जनजातीय अध्ययन।
