• July to September 2026 Article ID: NSS10017 Impact Factor:8.05 Cite Score:24 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    सतनाम पंथ एवं सतनामी समाज: एक सांस्कृतिक परिदृश्य

      लक्ष्मी नारायण कुर्रे
        शोधार्थी (इतिहास) डॉ. सी. व्ही. रमन विश्वविद्यालय, करगीरोड, कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)
      डॉ. महेश कुमार शुक्ला
        शोध निर्देशिक (इतिहास) डॉ. सी. व्ही. रमन विश्वविद्यालय, करगीरोड, कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)

शोध सारांश-सतनाम पंथ भारतीय भक्ति-परंपरा की निर्गुण धारा से जुड़ा एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन है, जिसने ‘सतनाम‘ अर्थात् सत्य-नाम को अपनी आस्था का केंद्र बनाया। उत्तर भारत में इसकी जड़ें सत्रहवीं सदी तक जाती हैं, जबकि मध्य भारत, विशेषकर छत्तीसगढ़ में इसे अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में संत गुरु घासीदास ने संगठित स्वरूप दिया। यह शोध-पत्र पंथ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक सिद्धांतों, सामाजिक संगठन, प्रतीकों, लोककला पर्व-मेलों, संस्कारों तथा समकालीन परिवर्तनों का विवरणात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि सतनामी संस्कृति सत्य, समानता, अहिंसा, संयम और श्रम की गरिमा जैसे मूल्यों पर आधारित है और यह जातिगत ऊँच-नीच के विरुद्ध एक सशक्त सांस्कृतिक प्रतिरोध भी रही है।

शब्द कुंजी-सतनाम पंथ, सतनामी समाज, गुरु घासीदास, छत्तीसगढ़, पंथी नृत्य, जैतखाम, सामाजिक समानता।