• January to March 2024 Article ID: NSS8541 Impact Factor:7.60 Cite Score:1003 Download: 43 DOI: https://doi.org/ View PDf

    पद्मावत में लोक-संस्कृति की अभिव्यक्ति

      डाॅ संगीता मरावी
        सहायक प्राध्यापक (हिन्दी) पं.शम्भूनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल (म.प्र.)
  • प्रस्तावना - अपनी रचनाओं में लोक-जीवन का चित्रण करने में वहीं कवि या लेखक समर्थ और सफल होता है जिसने लोक-जीवन के साथ घुल-मिल कर उसका निकट से अध्ययन किया हो। वाल्मीकि, व्यास, होमर, शेक्सपीयर, जगनिक, जायसी, तुलसी, प्रेमचन्द, गोर्की आदि विश्व साहित्य के ऐसे ही मनीषी कलाकार हुए हैं। जायसी को लोक-जीवन का गहरा और विस्तृत अनुभव था। कवीर के समान वह भी बचपन से साधु-फकीरों की संगति में देशाटन करते और लोगों से मिलते-जुलते रहे थे। यही लोक-जीवन को समझने और अनुभव करने का प्रधान साधन होता है। जायसी भी यदि दरबारी-कवियों के समान किसी राजा या नवाब के दरबार में रहते तो ’पद्मावत जैसे सशक्त काव्य की रचना करने में असमर्थ रहते । हिन्दी का कोई भी सुफी कवि दरबारी कवि नहीं था। ये लोग तो प्रेम के दीवाने उपासक थे, इसलिए राजसी दरबारी वातावरण इन्हें कभी रास ही नहीं आ सकता था। जायसी पर कुछ आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि उनके ’पद्मावत में लोक-जीवन का वैसा विस्तृत और गहन चित्रण नहीं हुआ है जैसा कि तुलसी के ’रामचरित मानस में मिलता है, यह आरोप गलत है। इसे सिद्ध करने क¢ लिए हमें ’पद्मावत  में लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति को विस्तार से चर्चा करनी होगी।