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January to March 2024 Article ID: NSS8602 Impact Factor:7.67 Cite Score:6014 Download: 108 DOI: https://doi.org/ View PDf
भारतीय नारी जगत एवं श्री कृष्ण की भूमिका एवं मान्यता
डॉ. रमा आमेटा
सहायक आचार्य (संस्कृत) विद्या सम्बल योजना राजकीय महाविद्यालय, वल्लभनगर, उदयपुर (राज.)
प्रस्तावना- भारतीय संस्कृति में
नारी जीवन की जो अक्षुण्ण महत्ता रही है, उसकी
अपनी एक परम्परा और उसका अपना एक सुदीर्घकालिक इतिहास रहा है। वाल्मीकि से पूर्व
उसे जिस महनीय रूप में देखा जाता रहा, उसकी
संक्षिप्त रूपरेखा राजा दशरथ और राम के जीवन में मिलता है। यद्यपि वाल्मीकि के बाद
महाभारत का एक ऐसा अवश्य क्षुब्ध समय आया, जिसमें उसकी उपेक्षा दिखाई देती
है। राज्य लिप्सा में पूरी तरह डूबे कौरव अपनी स्वार्थान्धता में सने पगे अपने ही
पारम्परिक आचरण को एक ओर धकेल कर अपने जीवन में उत्सव मना रहे थे और पापाचरण की
सीमा को लॉघकर अपनी सनातन परम्परा को ठुकरा रहे थे, तथा यह समझते हुए भी कि उनकी यह
गति एक दिन उनकी दुर्गति का कारण बनेगी, अपने
को रोक नहीं पा रहे थे।