• October to December 2024 Article ID: NSS8929 Impact Factor:8.05 Cite Score:79 Download: 10 DOI: https://doi.org/ View PDf

    जल अधिग्रहण या जलग्रहण क्षेत्र कार्यक्रमों की पर्यावरण प्रबंधन में भूमिका

      नेहा शर्मा
        शोधार्थी (भूगोल विभाग) श्री खुशाल दास विश्वविद्यालय, पिलीबंगा, हनुमानगढ़ (राज.)
      डॉ. राजू शर्मा
        शोध निर्देशक (भूगोल विभाग) श्री खुशाल दास विश्वविद्यालय, पिलीबंगा, हनुमानगढ़ (राज.)
  • शोध सारांश-  जल-अधिग्रहण या जल-ग्रहण वह भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें गिरने वाला जल एक नदी या एक-दूसरे से जुड़ती हुई कई छोटी नदियों के माध्यम से एकत्रित होकर एक स्थान से होकर बहता है। ढालू एवं पर्वतीय क्षेत्रों में केवल देखने से ही जल-अधिग्रहण क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है। नदी के संगम स्थल से ऊपर की और का क्षेत्र जिसमें सीमा निर्धारित करेंगा, जैसे विकास खंड, गाँव व जिला आदि की अपनी एक भौगोलिक सीमा होती है, परन्तु उक्त सीमा प्रकृति द्वारा निर्धारित होती है और इसमें प्रशासकीय आवश्यकताओं हेतु परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

    सामान्यतः कुछ लक्षण छोटे अथवा बडे़ हर जल-अधिग्रहण में विद्यमान रहते हैं, जैसे-प्रत्येक जल-अधिग्रहण क्षेत्र का सम्पूर्ण पानी सिर्फ एक निकास से जल-अधिग्रहण की सीमा पार करता है। कोई भी क्षेत्र एक ही श्रेणी के दो जल-अधिग्रहण में नहीं आता है।

         पिछले कुछ वर्षो में विकास संस्थाओं के मध्य जल-अधिग्रहण शब्द बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। विभिन्न विकासात्मक योजनाएँ, चाहे वे सरकारी हों या गैर सरकारी, जो जल-अधिग्रहण की अवधारणा से प्रभावित हुई हैं और उन्हें ही पुनः परिभाषित किया जा रहा है।

    विकास से सम्बन्धित पूर्व के अनुभवों पर आधारित विशेषकर सूख सम्मभावित व पर्वतीय क्षेत्रों में यह महसूस किया गया है कि विभिन्न विकास कार्यक्रमों का परस्पर समन्वय अधिकतम सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। विकास के नाम पर पिछले कुछ दशकों में विकास संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया गया है। फलतः अधिकांश क्षेत्रों में संसाधनों की उपलब्धता में अत्यधिक कमी का अनुभव किया जा रहा है, जो कि ढाँचागत विकास पर भी विपरीत प्रभाव डाल रही है।


    शब्द कुंजी-जल अधिग्रहण, जलग्रहण,भू-जल, प्रबंधन, जल संरक्षण, जल पुनर्भरण, जीवन की गुणवत्ता,जल संकट।