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January to March 2025 Article ID: NSS8953 Impact Factor:8.05 Cite Score:120 Download: 14 DOI: https://doi.org/ View PDf
महात्मा गाँधी और उनका दर्शन
डॉ. श्रीमती बिन्दू परस्ते
सहा. प्राध्यापक (हिन्दी) प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस श्री अटल बिहारी वाजपेयी, शा. कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इन्दौर (म.प्र.)
प्रस्तावना- महात्मा गाँधी ना तो एक
दार्शनिक थे जिन्होंने गहन अध्ययन एवं मनन के पश्चात एक सुव्यवस्थित दर्शन प्रस्तुत
किया हो ना ही वे एक राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने राजनीति को राजनीति मानकर एक नेता की
भूमिका निभाई हो और न ही वे एक संत थे जिन्होंने इस जगत को मिथ्या मानकर अपने को ब्रह्म
में लीन कर लिया हो। किंतु अजीब बात है - वे यह सब कुछ न होते हुए भी यही सब कुछ थे।
अपने जीवन दर्शन को व्यवस्थित रूप देने का अवकाश नहीं था। फिर भी दार्शनिक मुद्रा में
कठोर सिद्धांतों का पालन किया। राजनीतिक राजनीतिज्ञ ना होते हुए भी उन्होंने अपने देश
और विदेश की राजनीति से हर क्षण सम्बन्ध रखा। गुफावासी संसार त्यागी संत न होते हुए
भी मसीहायी अन्दाज प्रखर रहा। उनका सर्व व्यापी व्यक्तित्व अक्षितिज फैला रहा तथा उनके
कृतित्व में मानव जीवन के हर पहलू को सधिकार आत्मसात किया। व्यक्ति, परिवार, समाज,
जाति, संस्कार, संपत्ति, भोजन, चिकित्सा, वाणिज्य, कला, विज्ञान, राजनीति शास्त्र,
अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मानव शास्त्र, मनोविज्ञान, प्रेम, सौन्दर्य, विवाह, ब्रह्मचर्य,
पठन-पाठन, भाषण, लेखन, सम्पादन, आंदोलन, अहिंसा, सत्य, ईश्वर, धर्म, नीति, नियम, जीवन,
मृत्यु, इन सभी विषयों पर उन्होंने चिंतन किया। लोगों ने उन्हें देखा, सुना, पढ़़ा,
सहमत असहमत हुए, उनका तीव्र समर्थन किया, उनका घोर विरोध किया किंतु प्रेम और श्रृद्धा
उन्हें जितना मिला, उतना विश्व में किसी एक व्यक्ति को नहीं मिला, क्योंकि उनके विरोधी
भी उन्हें एक व्यक्ति के रूप में प्रेम करते रहे ।














