• January to March 2025 Article ID: NSS8978 Impact Factor:8.05 Cite Score:86 Download: 11 DOI: https://doi.org/ View PDf

    छठी शताब्दी ईसापूर्व में पर्यावरण चेतना का विकास

      डॉ. नीलम सोनी
        असि0 प्रोफेसर, रामसहाय राजकीय महाविद्यालय, शिवराजपुर, कानपुर (उ.प्र.)
  • प्रस्तावना-सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव एवं पर्यावरण का गहरा संबंध रहा है। पर्यावरण के प्रति सभी धर्मों का दृष्टिकोण सकारात्मक रहा है, भारतीय संस्कृति ने पर्यावरण को हमेशा से ही पूजनीय माना है। सिन्धु घाटी सभ्यता से हमें अंसख्य ऐसे उदाहरण प्राप्त होते हैं जिसमें मानव के द्वारा, नीम, तुलसी, पीपल, बरगद, आदि अनेक वृक्षों को पूजने की परंपरा विद्यमान थी जो आज तक चली आ रही है प्रवृति के प्रति यह आस्था हमें पर्यावरण के प्रति सुरक्षा की भावना को जन्म देती है अगर हम पूर्व समय में मुड़कर देखेगं तो हम यह पायेंगे कि प्रकृति ने सिर्फ हमें साफ-स्वच्छ वातावरण दिया है जिसमे मानव ने अपना शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक विकास कर अपने व्यक्तित्व का विकास कर जीवन को सफल बनाया है। अगर हम प्राचीन काल की बात करे तो उस समय का मानव पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक था। सिन्धु घाटी की सभ्यता में अनेक वृक्षों की पूजा की जाती थी कहीं न कहीं मानव की यह आस्था मानव एवं पर्यावरण के प्रति प्रेम के दर्शाती है। इसी तरह का प्रकृति प्रेम हमें वैदिक संस्कृति में देखने को मिलता है हमारे महाकाव्यों रामायण एवं महाभारत में भी मनोरम प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन हमे अनेक साहित्यक ग्रंथों में प्राप्त होता है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण मे श्री राम के द्वारा 14 वर्ष के वनवास का समय जो उन्होंने वनों में बिताया था अनेक साहित्यक ग्रंथो में उनका सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है। महाभारत मे भी हमे अनेक मनोरम दृश्यों का उल्लेख साहित्यक ग्रंथों से प्राप्त होता है।