• April to June 2025 Article ID: NSS9217 Impact Factor:8.05 Cite Score:14557 Download: 168 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9217 View PDf

    काव्यशास्त्रीय परंपरा में श्वेतांबर जैन आचार्य नमिसाधु-परिचय

      डॉ. रागिनी श्रीवास्तव
        असिस्टेंट प्रोफेसर (संस्कृत) शशि भूषण बालिका डिग्री कॉलेज, लखनऊ (उ.प्र.)

प्रस्तावना-  “साहित्य समाज का दर्पण है” यह उक्ति स्वंय में विशद अर्थ समेटे है।साहित्य ज्ञान विज्ञान का विषय है,एक नवीन सोच है, और समाज की झलक है। संस्कृति के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए, परंपरागत ज्ञान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए साहित्य एक मजबूत स्तंभ है। साहित्य गंगा में सारे दर्शन समाहित होकर एक नवीन दृष्टि से साहित्य और समाज के हर पहलू का स्पर्श करते हैं। इसी क्रम में जैन दर्शन के आचार्यों ने भी हर पक्ष का स्पर्श किया है,चाहे वह धर्म हो,कला हो, संस्कृति हो, राजनीति हो,या साहित्य हो।