-
July to September 2025 Article ID: NSS9301 Impact Factor:8.05 Cite Score:60310 Download: 346 DOI: https://doi.org/ View PDf
कबीर का समाज दर्शनः मध्यकलीन भारत में एक क्रांतिकारी स्वर
डॉ. राजाराम परते
सहायक प्राध्यापक, शासकीय महाविद्यालय, बिजावर, जिला-छतरपुर (म.प्र.)
शोध सरांश - मध्यकालीन भारत में कबीर (14वीं - 15वीं शताब्दी) एक निर्गुण संत कवि थे जिनकी वाणी सामाजिक समता, मानवता और एकात्मवाद पर आधारित थी। उन्होंने जाति-पांति के विभाजन, धार्मिक आडम्बर, पाखंड और अंधविश्वासों की तीखी आलोचना की। कबीर का मूल्य संदेश था कि सम्पूर्ण मानव एक ही है और परमात्मा एक है। उनकी सरल साहसी और तर्कपूर्ण भाषा आज भी अत्याधुनिक लगती है। कबीर के दोहे आज भी धर्म निरपेक्षता, सामाजिक समानता और आत्मिक चिंतन के प्रतीक है।
शब्द कुंजी- एकात्मवाद, आडम्बर, पाखंड, अंधविश्वास,
कटाक्ष, निर्विवाद, उलटबाॅसिया, बौराना।
