-
April to June 2025 Article ID: NSS9385 Impact Factor:8.05 Cite Score:52818 Download: 324 DOI: https://doi.org/ View PDf
रामचरितमानस में राजधर्म
रणधीर झा
इंदिरा प्रियदर्शिनी महाविद्यालय, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)अन्नु झा
इंदिरा प्रियदर्शिनी महाविद्यालय, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)जैमिनी खानवे
इंदिरा प्रियदर्शिनी महाविद्यालय, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
शोध सारांश- प्रत्येक व्यक्ति इस भू-भाग के किसी ना किसी क्षेत्र में निवास करता है। समूह में रहने से वह, समाज का निर्माण कर लेता है, और समाज मिलकर, राष्ट्र का निर्माण करता है। इस प्रकार भू-भाग का वह क्षेत्र ही, देश अथवा राष्ट्र के रूप में परिभाषित होता है। समाज, सरल व सहज रूप से व्यवस्थित होकर गतिशील एवं सक्रिय रहे व सुख-शांति की प्राप्ति हो, यह कर्तव्य समाज में रहने वाले प्रजा या नागरिक का होता है। समाज जब अव्यवस्थित होने लगता है, तब उस भू-भाग में निवासरत समाज को नियंत्रित करने हेतु नियंत्रक के रूप में राजा की आवश्यकता होती है। यह राजा ही, धर्म-शास्त्र, नीति-शास्त्र में वर्णित नियमों के अनुसार राज्य का संचालन करता है, और यही राजा का राजधर्म होता है। प्रजा के मध्य राजा की प्रशस्ति, राजा के नीतिज्ञ होने अथवा ना होने में निहित होती है। विभिन्न धर्मशास्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, मनुस्मृति व नीतिशास्त्र में राजधर्म के विभिन्न मूल्यों का उल्लेख किया गया है, जिस आधार पर वैदिक कालीन राजा, राजधर्म का निर्वहन किया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास कृत-रामचरितमानस के अनुसार, तुलसी का राजा-श्रीराम, दिव्य गुणों से सम्पन्न, धर्म-शास्त्र के आधार पर राजधर्म का पालन करते दिखाई पड़ते है, राजा-श्रीराम की यह वैशिष्ठता ही ‘‘राम-राज्य’’ की संकल्पना का विकास करती है।
शब्द कुंजी-रामराज्य, तुलसी, रामचरितमानस, राजधर्म ।
