• July to September 2025 Article ID: NSS9409 Impact Factor:8.05 Cite Score:8319 Download: 127 DOI: https://doi.org/ View PDf

    दलितों की कुंठा

      डॉ. मनीषा सिंह मरकाम
        सहायक प्राध्यापक (हिन्दी) प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेस, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर (म.प्र.)
       
      पूजा वर्मा
        शोधार्थी, प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेस, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर (म.प्र.)

शोध सारांश - स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में हिंदी साहित्य में दलित जीवन को लेकर संवेदना बढ़ी लेकिन यह मुख्य रूप से ऊंची जाति के लेखकों द्वारा व्यक्त की जाती रही। प्रेमचंद जैसे लेखक अपने उपन्यासों में दलित पत्रों को शामिल करते थे लेकिन यह सहानुभूति प्रधान चित्रण था जिसमें दलितों की वास्तविक आवाज गायब थी।      

     मोहनदास नैमिशराय हिंदी दलित साहित्य में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुए हैं। उन्होंने दलित समाज के वास्तविकता को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया और उनके संघर्षों को साहित्य में एक नए दृष्टिकोण के साथ रखा। उनका साहित्य केवल शोषण की बात नहीं करता बल्कि सामाजिक बदलाव, आत्म सम्मान और राजनीतिक चेतना की ओर भी संकेत करता है। उन्होंने अपने साहित्य में हिंदी दलित उपन्यासों को आत्मकथात्मक शैली से बढ़ाकर सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक विमर्श से जोड़ा। इस प्रकार उन्होंने दलित समाज की आवाज को बुलंद किया। मोहनदास जी के उपन्यासों में दलितों की कई प्रकार की कुंठाएं हमें देखने को मिलती है। नब्बे के दशक में दलित आत्मकथाओं का दौर प्रारंभ हुआ। मोहनदास जी ने अपनी पहली दलित आत्मकथा लिखी, जिसने हिंदी साहित्य में दलित जीवन का आईना सबके सामने रख दिया है।

शब्द कुंजी - संजोया- एकत्रित करना, गुलामी -दासता, समृद्ध -विशाल, परिपाटी - प्राचीन समय की परंपरा।