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October to December 2025 Article ID: NSS9453 Impact Factor:8.05 Cite Score:36297 Download: 268 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9453 View PDf
मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास त्रिमाया: मातृ सत्ता और इकोफेमिनिज्म का जीवंत दस्तावेज
हिमांशु नागदा
शोधार्थी (हिंदी) तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनशाला, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर (म.प्र.)डॉ. विजयलक्ष्मी पोद्दार
प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष (हिंदी) एम.के.एच.एस गुजराती गर्ल्स कॉलेज, इंदौर (म.प्र.)
शोध सारांश- उपन्यास त्रिमाया मातृवंशी समुदायों की सामाजिक संरचनाओं, स्त्री-केन्द्रित सांस्कृतिक परंपराओं और प्रकृति–मानव अंतर्संबंधों का विश्लेषणात्मक रूप से अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह कृति हाथी-समूह की प्राकृतिक जीवन-व्यवस्था से लेकर खासी तथा नायर समाज की मातृसत्तात्मक प्रणालियों तक एक वैचारिक अनुक्रम निर्मित करती है, जिसके माध्यम से मातृसत्ता के विविध रूपों, वंशानुक्रम, सामुदायिक नेतृत्व और सांस्कृतिक स्मृतियों का तुलनात्मक परीक्षण संभव होता है। उपन्यास इको-फेमिनिज़्म की अवधारणाओं विशेषतः स्त्री और प्रकृति के पारस्परिक सह-निर्भर संबंध को साहित्यिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से नए आयाम प्रदान करता है। माया, सोपान और माइया मार्गरीटा जैसे पात्रों के माध्यम से यह कृति व्यक्तिगत अनुभवों को व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में रूपांतरित करती है तथा मातृसत्ता के विघटन और पितृसत्ता के उभार की प्रक्रियाओं को चिन्हित करती है। इस प्रकार त्रिमाया मातृसत्ता एवं इको-फेमिनिज़्म के अध्ययन हेतु एक प्रासंगिक साहित्यिक दस्तावेज के रूप में उभरता है।
शब्द कुंजी – मातृसत्ता, इकोफेमिनिज्म, स्त्री-नेतृत्व, प्रकृति, समुदाय, पर्यावरण।
