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October to December 2025 Article ID: NSS9473 Impact Factor:8.05 Cite Score:6949 Download: 116 DOI: https://doi.org/ View PDf
राजस्थान में परम्परागत छापा कला की अलंकरण विधा: सौंदर्यात्मक पक्ष एवं वर्तमान परिवेश में उसकी उपादेयता
राधापाल
शोधार्थी, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)डॉ. मनीषा चैबीसा चौबीसा
शोध निर्देशक, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)
शब्द कुंजी-परम्परागत परिधान, छापा
कला, अलंकरण, कलात्मक एवं सौंदर्यात्मक सज्जा, भाँत।
प्रस्तावना- जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ
रोटी, कपड़ा और मकान ने मानव सभ्यता के विकास में वस्त्र निर्माण कला, शारीरिक सौंदर्य
तथा प्रकृति व परिवेश के साथ सामंजस्य करते हुए, परिधानों को नवीन आयाम प्रदान किया।
इसी के परिणामस्वरूप वर्तमान में विभिनन रंगों, डिजाईन अलंकरण तथा स्टाईल ने वस्त्र
सज्जा के द्वारा मनुष्य शरीर को सुसज्जित किया है। सौंदर्य के विभिन्न रूपों जैसे-
बिंदी, सिन्दूर, रंग बिरंगे वस्त्र, अल्ता, मेहंदी या फिर आभूषणें द्वारा समय-समय पर
वातावरण, परिवेश जाति, संस्कृति एवं सभ्यता के साथ धर्म को भी प्रभावित किया है। इसी
प्रकार उत्सव, त्यौहार, विवाह आदि में भी भांति-भांति के डिजाईनर वस्त्रों ने उत्सव
विशेष को नवीन ऊर्जा प्रदान की है। विभिन्न रंगों, डिजाईन व स्टाईल में वस्त्र सज्जा
से प्रसन्नता खुशहाली, उमंग और आकर्षण से समाज में नवीनता का संचार होता रहा है। मनुष्य
जीवन के खुशहाली और सभ्य समाज में जीवन्तता लाने का महत्वपूर्ण कार्य वस्त्र अलंकरण
द्वारा ही होता है।
