-
October to December 2025 Article ID: NSS9531 Impact Factor:8.05 Cite Score:2116 Download: 63 DOI: https://doi.org/ View PDf
1857 के बाद रियासतकालीन राजस्थान में उर्दू प्रेस और जनचेतना का विकास (1857-1940)
डॉ. नीलम
एसोसिएट प्रोफेसर, अपेक्स यूनिवर्सिटी, जयपुर (राज.)
शोध सारांश- 1857 के विद्रोह के पश्चात उत्तर भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने प्रेस पर कठोर नियंत्रण और सेंसरशिप लागू की। विशेष रूप से राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों, जैसे राजपूताना (वर्तमान राजस्थान), में सूचना के प्रवाह को सीमित कर दिया गया। ऐसी स्थिति में उर्दू प्रेस का उदय केवल समाचार-प्रसारण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सामाजिक सुधार, शैक्षिक चेतना, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक जागरूकता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।यह शोध-पत्र 1857 से 1940 के मध्य राजस्थान की रियासतों में सक्रिय उर्दू समाचारपत्रों की ऐतिहासिक यात्रा का विश्लेषण करता है और यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार उर्दू प्रेस ने औपनिवेशिक नियंत्रण तथा रियासतकालीन सत्ता संरचनाओं के बीच एक प्रभावी सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sphere) का निर्माण किया। अध्ययन प्राथमिक अभिलेखीय स्रोतों, समकालीन उर्दू समाचारपत्रों, प्रशासनिक दस्तावेजों तथा द्वितीयक साहित्य पर आधारित है। निष्कर्षतः यह शोध स्थापित करता है कि उर्दू प्रेस ने राजस्थान में आधुनिक जनचेतना और नागरिक संस्कृति के विकास में निर्णायक योगदान दिया।
शब्द कुंजी-उर्दू प्रेस, राजस्थान, 1857 का विद्रोह, रियासतें, जनचेतना, औपनिवेशिक शासन, सार्वजनिक क्षेत्र।
