• January to March 2026 Article ID: NSS9585 Impact Factor:8.05 Cite Score:2892 Download: 72 DOI: https://doi.org/ View PDf

    ‘संस्कार’ उपन्यास: परंपरा, धर्म और मानव चेतना का द्वंद्व

      मनोज कुमार मेहेर
        अध्यापक (हिंदी) डालमिआ महाविद्यालय, राजगांगपुर (ओडिशा)

शोध सारांश-  प्रस्तुत शोध-सार यू. आर. अनंतमूर्ति के प्रसिद्ध उपन्यास संस्कार में चित्रित परंपरा, धर्म और मानव चेतना के द्वंद्व के विश्लेषण पर केंद्रित है। यह उपन्यास भारतीय ब्राह्मण समाज की रूढ़ धार्मिक संरचना, नैतिक पाखंड तथा व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष को अत्यंत सूक्ष्मता से प्रस्तुत करता है।

    कथा नारणप्पा की मृत्यु से आरंभ होकर पूरे समाज को आत्ममंथन की स्थिति में ला खड़ा करती है। नारणप्पा परंपरागत मूल्यों का विरोधी है, जबकि प्राणेशाचार्य शास्त्रनिष्ठ जीवन का प्रतिनिधि। इन दोनों के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि धर्म जब मानवीय संवेदना से कट जाता है, तब वह केवल कर्मकांड बनकर रह जाता है। प्राणेशाचार्य का मानसिक द्वंद्व इस सत्य को उद्घाटित करता है कि कठोर धार्मिक अनुशासन मनुष्य को भीतर से रिक्त कर सकता है।

    उपन्यास में ब्राह्मण समाज की दोहरी नैतिकता, स्त्री की उपेक्षित स्थिति तथा सामाजिक भय का यथार्थ चित्रण मिलता है। चंद्रि का नारणप्पा का दाह-संस्कार करना इस बात का प्रतीक है कि सच्ची मानवता जाति और धर्म की सीमाओं से परे होती है। लेखक “संस्कार” शब्द को नया अर्थ देते हुए यह प्रतिपादित करते हैं कि वास्तविक संस्कार कर्मकांड नहीं, बल्कि करुणा, विवेक, आत्मचिंतन और नैतिक साहस में निहित हैं।

    अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि संस्कार परंपरा और आधुनिक चेतना के टकराव को उजागर करते हुए व्यक्ति को आत्मबोध की ओर ले जाता है। यह उपन्यास पाठक को अंधी धार्मिक मान्यताओं पर प्रश्न उठाने और मानवता को सर्वोच्च मूल्य मानने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार संस्कार केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का सशक्त दस्तावेज है, जो आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है।

शब्द कुंजी-परंपरा बनाम आधुनिकता, धर्म और मानव चेतना, ब्राह्मण समाज, आत्मसंघर्ष, नारी स्थिति, सामाजिक पाखंड, नैतिक मूल्य।