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January to March 2026 Article ID: NSS9616 Impact Factor:8.05 Cite Score:599 Download: 32 DOI: https://doi.org/ View PDf
इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यासों में नवउपनिवेशवाद का प्रभाव और किसान चेतना का स्वरूप
मनोज कुमार शर्मा
शोधार्थी (हिंदी) गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद (गुजरात)
शोध सारांश - इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यासों ने नवउपनिवेशवाद के प्रभाव और किसान चेतना
की जटिलताओं को अत्यंत यथार्थपरक, विचारोत्तेजक और संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त किया
है। इन उपन्यासों में वैश्वीकरण, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप, बाजारवाद, भूमि-अधिग्रहण,
महाजनी शोषण और सरकारी नीतिगत असमानताओं के कारण उत्पन्न कृषि संकट को गहराई से चित्रित
किया गया है। समकालीन उपन्यासकारों ने किसानों की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ाओं
को उजागर करने के साथ-साथ उनके भीतर उपजी जागरूकता, आत्मसम्मान, प्रतिरोध और संगठन
की भावना को भी प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया है। इन रचनाओं ने साहित्य को सामाजिक
यथार्थ का सजीव प्रतिबिंब बनाते हुए समाज और सत्ता को सवालों के कटघरे में खड़ा करने
का कार्य किया है। इस प्रकार इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यास साहित्यिक सौंदर्य के
साथ-साथ सामाजिक चेतना और परिवर्तन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं।
शब्द कुंजी-नवउपनिवेशवाद,
किसान चेतना, वैश्वीकरण, भूमि-अधिग्रहण, महाजनी सभ्यता, बाजारवाद, ग्रामीण जीवन, विस्थापन,
सरकारी नीतियाँ।
