• January to March 2026 Article ID: NSS9650 Impact Factor:8.05 Cite Score:762 Download: 36 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9650 View PDf

    भारतीय ज्ञान परंपरा और अज्ञेय के निबंध

      अंजलि पाण्डेय
        शोधार्थी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय, सीकर (राज.)
      प्रो.(डॉ.) राजेंद्र सिंह
        प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, उदयपुरवाटी, झुंझुनू (राज.)

शोध सारांश-  भारतीय ज्ञान परंपरा जो वैदिक काल से वर्तमान तक प्रवाहित हो रही है तथा संसार की सबसे पुरानी ज्ञान परंपरा में से एक है। व्यवस्था या विचार समय की मांग के अनुसार यह सनातन ज्ञान परंपरा आधुनिकता के साथ परिवर्धित और संशोधित होती जिससे उनकी सापेक्षता सतत् विद्यमान है। सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत जैसी कुरीतियों को मिटाकर हमने अपनी व्यापक दृष्टि का परिचय दिया है। भारतीय ज्ञान परम्परा में वैज्ञानिकता, तर्कशीलता एवं तटस्थता विद्यमान है, जो भारत को दुनिया के समक्ष विश्वगुरु के रूप में पहचान दिलाती है। भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रसार साहित्य के माध्यम से होता आया है जिसमें अज्ञेय का नाम एक अत्यंत आवश्यक कड़ी है। जो समस्त ज्ञान परंपरा के समायोजन पर बल देते हैं किंतु तर्क पूर्वक। पाश्चात्य परंपरा से आक्रांत ना होकर वे उसकी खामियाँ भी देखते हैं तथा हमें हमारी परंपरा की ओर उन्मुख करते हैं। साथ ही ऐसे मानकों के गठन का पक्ष रखते हैं, जो हमारी ज्ञान परंपरा को चक्रीय क्रम से आगे बढ़ाते रहें। प्रस्तुत शोध आलेख में अज्ञेय की इसी व्यापक दृष्टि का मूल्यांकन भारतीय ज्ञान परंपरा के परिपेक्ष्य में किया गया है। 

शब्द कुंजी- वैज्ञानिकता,तर्कशीलता,परंपरा,संस्कृति,इतिहास,राजनीति,सहृदयता,सनातन धारा,सम्यक ज्ञान,स्वायत्तता, सर्वांगीण विकास।