• January to March 2026 Article ID: NSS9677 Impact Factor:8.05 Cite Score:178 Download: 13 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9677 View PDf

    भारतीय टेराकोटा कला का पर्यावरण एवं सततविकास में योगदान (ऐतिहासिक सन्दर्भ में)

      पूजा जायसवाल
        शोध छात्रा, मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ.प्र.)
      प्रो. ज्योति शाह
        शोध पर्यवेक्षक, डॉ. अम्बेडकर राजकीय स्नातकोत्तर कालेज, ऊँचाहार, रायबरेली (उ.प्र.)

शोध सारांश- वर्तमान समय न केवल भारत वरन् पूरी दुनिया के लिए अत्यंत कठिन है। इस समय विश्व समुदाय अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, जिसमें प्रमुख है, जलवायु परिवर्तन। इस चुनौती के समाधान हेतु पर्यावरण एवं सतत् विकास के अनुकूल कार्य करने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन से निपटने की आकांक्षा ने टेराकोटा कला की ओर भारत के ध्यान को तीव्र कर दिया हैं, जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और स्थिरता को बढा़वा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। भारत में टेराकोटा शिल्प से जुड़े कारीगरों को जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है,  जैसे कि बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, उत्पादन प्रक्रिया और कारीगरों की आर्थिक स्थिरता को बाधित कर रही है। हालाँंकि टेरोकोटा मिट्टी के बर्तन एक पर्यावरण-अनुकूल सामग्री के रूप में उभरकर सामने आते है, जो पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक टिकाउपन और सतत् विकास से जोड़ते है। टेराकोटा कला की प्राकृतिक संरचना, उच्च पुर्नचक्रण क्षमता, उत्पादन के दौरान ऊर्जा, दक्षता और सांस्कृतिक महत्व इसे पर्यावरण का मित्र ओर मूल्यवान संसाधन बनाते है। यह शोधपत्र टेरोकोटा कला का जलवायु परिवर्तन के दौर में पर्यावरण और सतत् विकास में महत्व का विश्लेषण करता है, जिसमें जलवायु परिवर्तन, कारीगरों के समक्ष समस्या एवं कारीगरों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपनाई गई अनुकूल रणनीतियों का भी उल्लेख किया गया है।

शब्द कुंजी-जलवायु परिवर्तन, टेराकोटा, संरचना, उत्पाद प्रक्रिया, विशेषताएं, पर्यावरण, सतत विकास, योगदान।