• January to March 2026 Article ID: NSS9716 Impact Factor:8.05 Cite Score:56 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    कांकेर जिले में धान की कृषि एवं स्थानिक संदर्भ में जैव-विविधता

      डॉ. श्रवण कुमार नाग
        अतिथि प्राध्यापक (भूगोल) बी.सी.एस. शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, धमतरी (छ.ग.)

शोध सारांश-  अध्ययन क्षेत्र में धान का कुल क्षेत्रफल 171869 हेक्टेयर है। यह का 85.56 प्रतिशत है। धान की 300 से अधिक प्रजातियाॅं बोई जाती रही है। इसमें से 203 से अधिक प्रजातियाँ विलुप्त हुआ हैं, या प्रचलन में नहीं है। वर्तमान समय में अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत बीज 1010, 1001, आइ आर 64 प्रजाति के धान की कृषि अध्ययन क्षेत्र के धान के कुल क्षेत्रफल का 47 प्रतिशत भू-भाग पर बोया गया है इसके अतिरिक्त सोनम, चंदन, एच.एम.टी, सरना मासरी, सारथी, कोमल, महामाया, सोनाल, पूर्णिमा, एवं दुबराज बोया जाता है, साथ ही वे क्षेत्र जहां सिंचाई के पर्याप्त सुविधा है वहां हाई ब्रिड धान एराइज (6444) बोया गया है। इससे स्पष्ट है कि धान की अधिक उपज देने वाले प्रजाति एवं उन्नत बीजों के अधिक उपयोग से धान की प्राकृतिक प्रजातियों को हानि हुआ है, धान की प्रमुख प्रजाति जो विलुप्त हो चुका है। इस प्रकार विलुप्त हो रही प्रजाति के ऋणात्मक प्रभाव को ज्ञात करने की आवश्कता है। फसलों में रासायनिक किटनाशकों के प्रयोग से फसलों को हानि पहुचाने वाले किटों के साथ फसलों को लाभ प्रदान करने वाले जीव समूह भी नष्ट हो जाते हैं साथ ही मृदा की उर्वरता भी नष्ट हुआ है। मृदा की उर्वरता में वृद्धि करने हेतु प्रयुक्त रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग से भूमि की उत्पादकता में ऋणात्मक वृद्धि हुआ, इस प्रकार प्रति वर्ष अधिक उपज प्राप्त करने के लिए पहले की तुलना में अधिक रासायानिक उर्वरक की आवश्यकता होती हैं।