• January to March 2026 Article ID: NSS9775 Impact Factor:8.05 Cite Score:34 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    स्वामी विवेकानंद के व्यावहारिक वेदान्त दर्शन का अध्ययन

      डॉ. राजीव मुखर्जी
        अतिथि व्याख्याता (दर्शनशास्त्र ) शासकीय जे.योगानंद्म छत्तींसगढ महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

शोध सारांश-  यह अध्ययन स्वामी विवेकानंद   के उस दार्शनिक दृष्टिकोण पर केंद्रित है, जिसमें उन्होंने वेदान्त के शुद्ध आध्यात्मिक सिद्धांतों को जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास किया। स्वामीविवेकानंद  ने वेदान्त को केवल संन्यास या वैराग्य तक सीमित न रखते हुए उसे सामाजिक सेवा, मानव उत्थान, शिक्षा, नैतिकता और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार बनाया। इस शोध का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि स्वामी विवेकानंद   का व्यावहारिक वेदान्त किस प्रकार व्यक्ति और समाज दोनों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है। उन्होंने आत्मा की दिव्यताऔर सभी जीवों में ईश्वर की उपस्थितिजैसे सिद्धांतों के माध्यम से मानव सेवा को ही सच्ची ईश्वर-भक्ति के रूप में स्थापित किया। उनके अनुसार, जब तक व्यक्ति स्वयं को पहचानकर अपनी अंतर्निहित शक्ति को जागृत नहीं करता, तब तक वह वास्तविक आध्यात्मिकता को प्राप्त नहीं कर सकता। 

    अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्वामी विवेकानंद  का दर्शन केवल सैद्धांतिक न होकर अत्यंत व्यवहारिक है, जो शिक्षा, नैतिक विकास, आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है। उनका दृष्टिकोण आधुनिक समाज की समस्याओं जैसे गरीबी, अशिक्षा, जातिवाद और नैतिक पतन के समाधान में भी प्रासंगिक है।    

    यह शोध गुणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों का विश्लेषण किया गया है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानंद   का व्यावहारिक वेदान्त दर्शन न केवल भारतीय दार्शनिक परंपरा का पुनर्व्याख्यान है, बल्कि यह वैश्विक मानवता के लिए भी एक प्रेरक और मार्गदर्शक सिद्धांत है, जो मानव सेवा ही ईश्वर सेवा हैकी अवधारणा को साकार करता है।