• April to June 2026 Article ID: NSS9810 Impact Factor:8.05 Cite Score:16 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य में आदिवासियों की सांस्कृतिक अस्मिता का अंतर्संबंध

      छबीलाल सिदार
        शोधार्थी (हिन्दी) डॉ. सी.व्ही. रमन विश्वविद्यालय करगी रोड कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)
      डॉ. आँचल श्रीवास्तव
        सह. प्राध्यापक (हिन्दी) डॉ. सी.व्ही.रमन विश्वविद्यालय करगी रोड कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)

शोध सारांश-  छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य यहाँ के मूल निवासियों के जीवन दर्शन को पूर्ण रूप से समृद्ध किया हुआ है। उनकी पहचान का आधार अर्थात् उनके ‘स्व का बोध ‘जल, जंगल तथा ज़मीन के साथ उनके गहरे जुड़ाव में निहित है। जब हम छत्तीसगढ़ी लोकगीत जैसे ’कर्मा, ’ददरिया या ’सुआ सुनते हैं, तो वे केवल संगीत मात्र नहीं होते, अपितु वे यहाँ के मूल निवासियों के सुख-दुख, अपने देवी-देवताओं के प्रति उनकी श्रद्धा तथा प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाते हैं। मूल निवासियों हेतु जंगल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है, वरन् यह उनके पूर्वजों से मिली एक विरासत है, एक ऐसा भाव जो उनके लोक साहित्य में पाए जाने वाले गीतों और लोककथाओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहता है। उनकी सांस्कृतिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘सामूहिकता की भावना है। जहाँ आधुनिक साहित्य अधिकांशतः व्यक्ति-केंद्रित होता है, वहीं छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य सम्पूर्ण समुदाय को अपने साथ लेकर चलता है और उसे आत्मसात करता है। उनके नृत्यों एवं गीतों में कोई एक अकेला नायक या पात्र नहीं होता, अपितु सम्पूर्ण समुदाय एक साथ, पूर्ण तालमेल के साथ थिरकता और झूमता है। यही सामूहिक भावना उनकी पहचान को अत्यधिक सुदृढ़ बनाती है। छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य एक ऐसे माध्यम के रूप में कार्य करता है जो आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के विरुद्ध मूल निवासियों की परंपराओं, विशिष्ट बोलियों और जीवन जीने के अनूठे माध्यमों की रक्षा करता है। लोक साहित्य एक दर्पण का काम करता है, जिसमें इन मूल समुदायों की गौरवशाली संस्कृति और उनकी अंतरात्मा की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

शब्द कुंजी-लोक साहित्य, सांस्कृतिक अस्मिता, आदिवासी संस्कृति, लोक-कल्याण, लोकगीतों, लोकनृत्यों, लोककथाओं।