• April to June 2026 Article ID: NSS9831 Impact Factor:8.05 Cite Score:20 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    आधुनिकता के प्रभाव में लोकगीत, लोकपरंपराएँ एवं पर्यावरण संरक्षण : भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन

      संदीप शर्मा
        रिसर्च स्कॉलर, रबींद्रनाथ टैगोर यूनिवर्सिटी, भोपाल (म.प्र.)
      डॉ. उषा वैद्य
        प्रोफेसर, ह्यूमैनिटीज और लिबरल आर्ट्स, रबींद्रनाथ टैगोर यूनिवर्सिटी, भोपाल (म.प्र.)

शोध सारांश- प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय लोक संस्कृति, लोकगीतों एवं लोकपरंपराओं में निहित पर्यावरणीय चेतना का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान, संरक्षण एवं नैतिक दृष्टिकोण प्राचीन काल से विद्यमान रहा है। लोकगीतों, धार्मिक परंपराओं, पर्व-त्योहारों एवं सामाजिक व्यवहारों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित होती रही है। वर्तमान समय में आधुनिकता, शहरीकरण एवं वैश्वीकरण के प्रभाव से पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं पर्यावरणीय चेतना में परिवर्तन देखा जा रहा है।

इस शोध पत्र का उद्देश्य यह अध्ययन करना है कि भारतीय लोक संस्कृति एवं लोक परंपराएँ पर्यावरण संरक्षण में किस प्रकार योगदान देती हैं तथा आधुनिकता के प्रभाव से इन परंपराओं में किस प्रकार परिवर्तन आया है। अध्ययन समाजशास्त्रीय एवं विश्लेषणात्मक शोध पद्धति पर आधारित है। शोध में विभिन्न समाजशास्त्रियों, मानवशास्त्रियों एवं पर्यावरणविदों के विचारों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि लोक संस्कृति पर्यावरणीय चेतना को विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है, किन्तु आधुनिकता एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण पारंपरिक पर्यावरणीय मूल्यों में कमी आती जा रही है।

शब्द कुंजी-लोकगीत, लोकपरंपराएँ, पर्यावरण संरक्षण, भारतीय संस्कृति, पर्यावरणीय चेतना, आधुनिकता, समाजशास्त्रीय अध्ययन, सांस्कृतिक परिवर्तन, सतत विकास।