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April to June 2026 Article ID: NSS9833 Impact Factor:8.05 Cite Score:13 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
किन्नर विमर्श की अभिव्यक्ति और अस्मिता : यमदीप उपन्यास के संदर्भ में
डॉ. गोविन्द नाएक
अतिथि अध्यापक (हिंदी ) मां माणिकेश्वरी विश्वविद्यालय, भवानिपाटणा, कलाहांडी (ओड़िशा)
शोध सारांश- लैंगिक
आधार पर मानव मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित है, स्त्री एवं
पुरुष। इन्हीं दो वर्गों के साथ-साथ मानव जाति में एक अन्य लिंग अर्थात् तृतीय
लिंग प्रकृति के इंसान भी उपस्थित हैं। सामान्यतः समाज में ऐसे मानव के लिए 'किन्नर' अथवा
'हिजड़ा' शब्द
प्रयोग किया जाता है। ये वे लोग होते हैं, जो लैंगिक
आधार से न तो पूर्णतः स्त्री होते हैं और न ही पूर्णतः पुरुष । कुछ विशेष अंगों
एवं गुण सूत्रों का नियत अनुपात में विकास न हो पाने के कारण, ये
लोग सामान्य स्त्री एवं पुरुष की भाँति न तो संभोग कर पाते हैं और न ही गर्भ धारण
कर सकते हैं।ईश्वर की सृष्टि बहुत हीं अदभुत है । सभी का निर्माण समान रूप से न
हुआ है, न ही सभी को समान सुविधा मिला है । मनुष्य में भी कई भेद
है । किन्नर समुदाय में जन्म हुए लोग मनुष्य है
या ओर कोई दूसरा जीव है ।ये आज भी प्रश्न का प्रसंग है?
घर में कुत्ते, बिल्ली, पशु, पक्षी
आदि सभी को रहने की अधिकार है लेकिन मनुष्य की योनि से जन्म हुए किन्नरों की
स्थिति भारत जैसे गणतांत्रिक देश सामान्य अधिकार नही मिल पाता है ।
शब्द कुंजी- विमर्श, अस्मिता, दलित, किन्नर, थर्ड जेंडर, ट्रांसफोबिया,मानवीय मूल्य, समानता अधिकार, सामाजिक उपेक्षा, आत्मस्वाभिमान, अभिव्यक्ति।
