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October to December 2025 Article ID: NSS9837 Impact Factor:8.05 Cite Score:6 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद के काव्य में प्रतिपादित दर्शन एवं वेदना : एक तुलनात्मक अध्ययन
डॉ. कवींद्र कुमार भारद्वाज
सहायक प्राध्यापक, शासकीय स्नातक महाविद्यालय, हाटपीपल्या, जिला देवास (म.प्र.)
शोध सारांश- हिन्दी साहित्य के इतिहास में छायावाद को आत्मानुभूति, रहस्यबोध, प्रकृति-सौंदर्य
तथा दार्शनिक संवेदना का स्वर्णयुग माना जाता है। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में
जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा का विशिष्ट स्थान है। दोनों कवियों ने मानवीय चेतना,
आध्यात्मिक अनुभव तथा वेदना को अपने काव्य का केंद्रीय विषय बनाया, किन्तु उनके दार्शनिक
दृष्टिकोण, अनुभूति के स्वरूप तथा अभिव्यक्ति की पद्धति में पर्याप्त भिन्नता परिलक्षित
होती है। जयशंकर प्रसाद के काव्य में कश्मीर शैव दर्शन, समरसता, आनंदवाद तथा मानवतावादी
दृष्टि का समन्वय दिखाई देता है, जबकि महादेवी वर्मा के काव्य में बौद्ध दुःखवाद, करुणा,
विरहानुभूति तथा आध्यात्मिक रहस्यवाद की प्रधानता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में दोनों
कवियों के दार्शनिक आधार, वेदना-बोध, रहस्यवाद, प्रतीक-विधान तथा प्रकृति-चित्रण का
तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि दोनों
कवियों की साधना-पद्धति भिन्न होते हुए भी उनका अंतिम लक्ष्य मानव चेतना का परिष्कार
एवं आत्मोन्नयन है।
शब्द कुंजी-छायावाद, दर्शन, वेदना, आनंदवाद, बौद्ध दुःखवाद, रहस्यवाद,
समरसता, करुणा।
