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April to June 2026 Article ID: NSS9855 Impact Factor:8.05 Cite Score:29 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
डिजिटल युग के वैवाहिक सम्बंधों में संवादहीनता और अलगाव : मोहन राकेश के सन्दर्भ में
गीता कुमारी
शोधार्थी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावटी विश्वविद्यालय, सीकर (राज.)डॉ. (प्रो.) अनुपमा सक्सेना
प्राचार्य, खंडेला महाविद्यालय, सीकर (राज.)
शोध सारांश- यह
शोध डिजिटल युग में स्त्री-पुरुष और उनके वैवाहिक सम्बंधों पर दृष्टि डालता है। इसमें
इस विषय पर अध्ययन किया जाएगा कि किस प्रकार डिजिटल युग के सम्बंधों में संवादहीनता
और अलगाव स्त्री-पुरुष के मध्य खाई उत्पन्न
कर रहे है। वर्तमान युग में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, पीढ़ीदर विचारगत भिन्नता, बेरोजगार युवा पीढ़ी,पश्चिमीकरण,
उपभोक्तावादी मान्यताएँ ,आकर्षक और चकाचौंध रिश्तें इत्यादि कारण स्त्री- पुरुष सम्बंधों
में अलगाव और खालीपन भरने में अपने-अपने स्तर पर योगदान दे रहे है।भारतीय विवाह संस्था
सामाजिक ढांचे को संतुलित करने के लिए मजबूत आधार रही है। रिश्तों की बुनियाद इस संस्था
के समाजीकरण पर ही निर्भर रही है लेकिन वर्तमान में इस विवाह संस्था पर कहीं न कहीं
प्रश्नचिन्ह लग रहे है। आज के दौर में सोशल मीडिया के माध्यम से वैवाहिक रिश्तें बन
रहे है और बिगड़ रहे है। जिससे दो लोगों के मध्य संवाद अंतराल और अलगाव भी बढ़ रहा है।
चूंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है और समाज में घटित घटनाएँ साहित्य का हिस्सा वैसे
ही बनती है जैसे समाज में वह मौजूद होती है
इसलिए साहित्य का प्रभाव समाज के प्रत्येक पक्ष पर पड़ता है। हिंदी साहित्य का प्रारंभिक
आधार आदर्शवादी पक्ष को केंद्र में रख कर आगे बढ़ा लेकिन समयानुसार उसी साहित्य ने आदर्शवादी
पक्ष में कई कमियां उजागर की और समाज के यथार्थवादी पक्ष को पाठक के समक्ष लाना उचित
समझा। इस आदर्शवादी और यथार्थवादी पक्ष का सबसे ज्यादा प्रभाव स्त्री-पुरुष सम्बंधों के वैवाहिक जीवन पर पर पड़ा।
स्वतंत्रता के बाद हिंदी साहित्य में आधुनिक मानव के सम्बंधों की सूक्ष्मता
उभर कर सामने आती है।यह सूक्ष्मता कथाकार मोहन राकेश के साहित्य में पाठक के समक्ष आती है। मोहन राकेश के साहित्य में
स्त्री हो या पुरुष सभी पूर्ण की छटपटाहट हेतु नज़र आते है। इनके साहित्य में स्त्री-पुरुष
सम्बन्धों की विविध मनोवैज्ञानिक स्थितियां चित्रित हुई हैं। इनके पात्र एक रिक्तता
का अनुभव करते है और पूर्ण प्राप्ति की ओर देखते है, जो कहीं न कही वर्तमान डिजिटल
युग में भी वही रिक्तता दृष्टिगत होती है। मोहन राकेश के पात्रों के मध्य संवाद-अंतराल
और अलगाव अत्यधिक है वहीं 21वी सदी के तीसरे दशक में आधुनिक रिश्तों की बुनवाट मोहन
राकेश के कथा साहित्य के पात्रों के समान ही नजर आ रही है क्योंकि यहां भी संवाद-अंतराल और अलगाव अत्यधिक है। जिस प्रकार से आज डिजिटल युग
में रिश्तें भावनात्मक कम और सांकेतिक ज्यादा हो गए है, वहीं राकेश जी के समकालीन साहित्य
में भी रिश्तें भावनात्मक होते हुए भी सांकेतिक ही नजर आते हैं। एक तरफ स्त्री पात्र
घर से बाहर निकलने और आत्मनिर्भर बनने की दौड़ में थी वही पुरुष उसी दौड़ में रिश्तों
के बुनवाट की नई परिभाषा देने में लगे हुए थे। इस प्रकार उस समय के वैवाहिक जीवन में
जो अलगाव था वो कहीं न कहीं आज के डिजिटल युग ने ओर ज्यादा बढ़ावा देने का कार्य किया
है। प्रस्तुत शोध में वर्तमान डिजिटल युग के वैवाहिक सम्बन्धों को मोहन राकेश के साहित्य
के संदर्भ में देखने का प्रयास किया गया है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होगा कि मोहन राकेश
द्वारा चित्रित समस्याएँ आज के डिजिटल युग में ओर भी अधिक प्रासंगिक हो गई हैं।
शब्द कुंजी-डिजिटल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, आत्मनिर्भरता, समस्याएँ,
रिक्तता, भावनात्मक दूरी, अलगाव, संवादहीनता,
वैवाहिक विघटन, पूर्ण-अपूर्ण, संस्कार, आदर्शवादी-यथार्थवादी, लॉन्ग डिस्टेंस, वर्क
फ्रॉम होम।
