• January to March 2026 Article ID: NSS9873 Impact Factor:8.05 Cite Score:24 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    भारतीय ज्ञान परम्परा में जैविक खेती : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य एवं समकालीन प्रासंगिकता

      डॉ. मधुसूदन चौबे
        एसोसिएट प्रोफेसर (इतिहास) प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस, शहीद भीमा नायक शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बडवानी (म.प्र.)

शोध सारांश-भारतीय सभ्यता का विकास प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित रहा है। भारतीय ज्ञान परम्परा में कृषि को केवल आजीविका या उत्पादन का साधन नहीं माना गया, बल्कि उसे धर्म, संस्कृति, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक जीवन का आधार स्वीकार किया गया है। वैदिक साहित्य, कृषि पाराशर, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, वृक्षायुर्वेद, बृहत्संहिता तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में कृषि संबंधी ऐसे अनेक सिद्धांत वर्णित हैं, जिनमें भूमि की उर्वरता, जल संरक्षण, बीज चयन, गो-आधारित कृषि, प्राकृतिक खाद, फसल विविधता तथा जैव विविधता के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। इन सिद्धांतों का मूल उद्देश्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए कृषि उत्पादन को स्थायी एवं समृद्ध बनाना था।

वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा की उर्वरता में कमी, जल प्रदूषण, जैव विविधता का ह्रास तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। ऐसी परिस्थितियों में जैविक खेती एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। यद्यपि आधुनिक अर्थों में जैविक खेती का औपचारिक विकास बीसवीं शताब्दी में हुआ, तथापि इसके अनेक मूलभूत सिद्धांत भारतीय कृषि परम्परा में प्राचीन काल से विद्यमान रहे हैं। इसलिए भारतीय ज्ञान परम्परा का ऐतिहासिक पुनर्पाठ आज की सतत कृषि व्यवस्था के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा में वर्णित कृषि संबंधी सिद्धांतों का ऐतिहासिक विश्लेषण करना तथा उनका आधुनिक जैविक खेती की अवधारणाओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन करना है। यह अध्ययन गुणात्मक एवं ऐतिहासिक शोध पद्धति पर आधारित है, जिसमें वैदिक साहित्य, प्राचीन संस्कृत ग्रंथों, भारतीय कृषि संबंधी पारंपरिक स्रोतों तथा आधुनिक शोध साहित्य का सम्यक् विश्लेषण किया गया है।

अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान परम्परा में प्रतिपादित कृषि सिद्धांत वर्तमान समय की जैविक खेती, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा सतत कृषि विकास की अवधारणाओं के साथ उल्लेखनीय साम्य रखते हैं। यदि इन सिद्धांतों का वैज्ञानिक परीक्षण एवं समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्प्रयोग किया जाए, तो कृषि, पर्यावरण संरक्षण तथा खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान प्राप्त किया जा सकता है।

शब्द कुंजी- भारतीय ज्ञान परम्परा, जैविक खेती, सतत कृषि, कृषि पाराशर, वृक्षायुर्वेद, पारम्परिक कृषि ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य।