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April to June 2026 Article ID: NSS9883 Impact Factor:8.05 Cite Score:23 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
हिन्दी उपन्यासों में पुरुष संवेदना
सुनीता मीना
शोधार्थी (हिंदी) मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)
शोध सारांश- प्रकृति की सुन्दरता नैसर्गिक रूप से
दो विपरीत ध्रुवों पर आश्रित रहती है, वह दोनों धुरियाँ नर और नारी है जो जीवन के नवाचार से सम्बंधित है।
हिंदी साहित्य का लेखन कभी भी एक ओर झुका हुआ नहीं रहा है। हिंदी साहित्य ने भी
लगातार इस क्रम को संतुलित रखा है। जैसे-जैसे नवीनता का प्रादुर्भाव हुआ है वैसे
ही हिंदी जगत ने अपनी कलम को भी उसी ओर ढाला है। परिवर्तन,विकास, क्रांति ये प्रकृति के शाश्वत नियम
हैं। हर युग में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए हैं, आज भी हो
रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिसके फलस्वरूप व्यवस्था में परिवर्तन होता है और
निरंतर विकास का मार्ग प्रशस्त होता रहा है। हिंदी साहित्य में स्त्री संवेदना पर
विपुल कार्य हुआ है, परंतु पुरुष संवेदना के स्तर पर
गंभीर, सुसंगत एवं व्यवस्थित अध्ययन की कमी रही है।
पितृसत्ता के भीतर भी पुरुष किस प्रकार मानसिक द्वंद्व, सामाजिक
दबाव और भावनात्मक कुंठाओं से ग्रस्त होता हैयह पक्ष साहित्यिक विश्लेषण के लिए
अपेक्षित है। यह शोध साहित्य में पुरुष की छवि को एक नई दृष्टि देने का प्रयास
करेगा।
शब्द कुंजी-संवेदना, मानसिक द्वंद्व, सामाजिक दबाव, समाज,परिवार, जीवन आकांक्षा।
