• April to June 2026 Article ID: NSS9890 Impact Factor:8.05 Cite Score:36 Download: 0 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9890 View PDf

    रामस्वरूप चतुर्वेदी की आलोचनात्मक दृष्टि में आधुनिक कविता

      सारिका पाण्डेय
        शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली

शोध सारांश - यह ज्ञातव्य है की हिंदी समीक्षा के परिदृश्य में रामस्वरूप चतुर्वेदी का आगमन 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध (1931-2003) के बीच हुआ। स्वतंत्रता के पश्चात् हिन्दी समीक्षा के परिदृश्य में रामस्वरूप चतुर्वेदी के हस्तक्षेप का अत्यंत शुभ प्रभाव दिखाई पड़ता है। इन्होंने अपनी व्यावहारिक तथा सैद्धांतिक समीक्षा पद्धतियों द्वारा एक संतुलित तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की स्थापना की है। रामस्वरूप चतुर्वेदी सही मायने में साहित्यालोचन की इस श्रेष्ठ परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जहां केन्द में कृति है। इसी कृति की पुनर्रचना को वे आलोचना मानते हैं। अपने इन्हीं आलोचनात्मक प्रतिमानों के प्रकाश में आलोचक ने आधुनिक हिंदी कविता का तार्किक मूल्यांकन किया है। इनसे पूर्व के आलोचकों ने शास्त्रीयवाद, मार्क्सवाद, रसवाद आदि सिद्धांतों के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन किया है। चतुर्वेदी जी ने भाषा की सृजनात्मकता को आधार बनाकर समीक्षाकर्म किया। साहित्य की आधुनिकता को वे पश्चिम से आयातित नहीं मानते बल्कि मध्यकालीन विसंगतियों- विद्रूपताओं से मुक्ति को ही वे आधुनिकता मानते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी की काव्यालोचना का वह पक्ष जो उन्हें अन्य समीक्षकों से भिन्न बनाता है वह है उनकी भाषिक सृजनात्मकता की तरफ ध्यान। भाषा तथा शैलीगत बारीकियों पर अत्यधिक ध्यान के कारण इनकी आलोचना पर ‘रूपवादी सौंदर्यशास्त्र’ की अतिशयता का आक्षेप लगता रहा है, परन्तु इनकी काव्यालोचना में सामाजिक तथा भाषिक दोनों पक्षों के प्रति एकसमान निकटता है। कुछ सीमाओं के बावजूद भी एक काव्यालोचक के रूप में इनकी सर्जनात्मक आलोचना यह सीख देती है कि -बिना पूर्वाग्रह की मुक्ति के आलोचना पुनर्सृजन तो दूर ढंग से सृजन भी नहीं रहती है। वह केवल पिष्टपेष्ण मात्र होती है। प्रस्तुत आलेख में आलोचक द्वारा स्थापित इन्हीं काव्यालोचना के मानदंडों पर विचार किया गया है कि क्या स्वयं आलोचक की काव्यालोचना इन मानदंडों पर खरी उतरती है अथवा नहीं।

शब्द कुंजी-सृजनात्मक आलोचना, काव्यभाषा, अर्थ-संधान, नवजागरण, स्वच्छंदतावाद, असंपृक्त, क्लासिक तथा रोमांटिक वृत्ति,द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, साठोत्तरी कविता, अकविता।