-
April to June 2026 Article ID: NSS9900 Impact Factor:8.05 Cite Score:3 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया में सामाजिक समस्याओं की प्रासंगिकता: वर्तमान परिदृश्य के संदर्भ में अध्ययन
निधी सिंह
शोधार्थी (हिन्दी) अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा (म.प्र.)डॉ. विनय कुमार सोनवानी
सह प्राध्यापक (हिन्दी) PMCoE शासकीय नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय , बुढ़ार, शहडोल (म.प्र.)
शोध सारांश- हिन्दी दलित साहित्य में
आत्मकथा लेखन ने दलित समाज के अनुभवों, संघर्षों और सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्ति प्रदान
की है। डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया इस परंपरा की एक महत्वपूर्ण कृति है। यह
आत्मकथा केवल एक व्यक्ति के जीवन-संघर्ष का दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में
व्याप्त जातिगत विषमता, आर्थिक अभाव, अशिक्षा, सामाजिक बहिष्करण, लैंगिक असमानता तथा
अंधविश्वास जैसी समस्याओं का यथार्थ चित्रण भी है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मुर्दहिया
में वर्णित सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण करते हुए उनकी वर्तमान भारतीय समाज में प्रासंगिकता
का अध्ययन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि संविधान द्वारा समानता और सामाजिक
न्याय की स्थापना के बावजूद अनेक सामाजिक समस्याएँ आज भी विभिन्न रूपों में विद्यमान
हैं। इस दृष्टि से मुर्दहिया समकालीन समाज को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
शब्द कुंजी-मुर्दहिया, तुलसीराम, दलित
साहित्य, सामाजिक समस्याएँ, जातिवाद, शिक्षा, सामाजिक न्याय, समकालीन समाज।
