• April to June 2026 Article ID: NSS9911 Impact Factor:8.05 Cite Score:12 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में सामाजिक चेतना

      डॉ. बालेश्वर प्रसाद
        ऐसोसिएट प्रोफेसर (हिन्दी) अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा, बाँदा (उ.प्र.)

शोध सारांश-केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में सामाजिक चेतना अत्यंत विकसित है। केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में प्रकृति, मानवीय संवेदनाएं, और मार्क्सवादी-यथार्थवादी चेतना के दर्शन होते हैं। उनकी रचनाओं में जनजीवन, किसान और शोषित वर्ग के संघर्ष का सजीव चित्रण मिलता है।केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में बुंदेलखंड की प्रकृति, नदियां, खेत और पेड़-पौधे बहुत सुंदर ढंग से उभरे हैं।उनकी प्रकृति कोई अमूर्त कल्पना नहीं, बल्कि जीवन और श्रम से जुड़ी जीवंत शक्ति है।केन नदी, बसंती हवा और ग्रामीण परिवेश उनके प्रकृति-प्रेम के मुख्य आधार हैं।वे प्रगतिशील और मार्क्सवादी विचारधारा के कवि हैं, जिन्होंने समाज के शोषक और शोषित वर्ग को करीब से देखा है।उनकी कविताओं जैसे श्हथौड़े का गीतश् में मजदूर और किसान की मेहनत, भूख और संघर्ष की सीधी बात होती है।वे आम आदमी के जीवन की धूल और पसीने को अपनी कला की ताकत बनाते हैं।मानवीय संवेदनाएं और प्रेम उनके काव्य में घरेलू जीवन, प्रेम और अपनेपन के भाव भी बहुत गहरे हैं जैसे श्हे मेरी तुम। वे नारी के समान अधिकारों और सम्मान के पक्षधर रहे हैं। इस प्रकार उक्त शोधपत्र की शोधात्मक विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में सामाजिक चेतना की चेतनाएँ विद्यमान हैं।