• July to September 2026 Article ID: NSS9940 Impact Factor:8.05 Cite Score:18 Download: 0 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9940 View PDf

    विपश्यना साधना और भावनात्मक समायोजन के बीच संबंध: एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

      डॉ. विनेता
        असिस्टेंट प्रोफेसर (मनोविज्ञान) इस्माईल नेशनल महिला पीजी कॉलेज, मेरठ (उ.प्र.)

शोध सारांश-  मानव जीवन में भावनाएँ व्यक्ति के व्यवहार, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक संबंधों को निर्धारित करने वाली महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ हैं। वर्तमान युग में तीव्र सामाजिक परिवर्तन, प्रतिस्पर्धा, तकनीकी निर्भरता और जीवनशैली में बदलाव के कारण व्यक्ति तनाव, चिंता, क्रोध, निराशा और भावनात्मक अस्थिरता जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों में भावनात्मक समायोजन व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के लिए आवश्यक माना जाता है।

विपश्यना साधना एक प्राचीन ध्यान प्रणाली है जो व्यक्ति को अपने विचारों, भावनाओं और शारीरिक अनुभवों के प्रति सजग बनाती है। यह साधना व्यक्ति को भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें समझने, स्वीकार करने और संतुलित प्रतिक्रिया देने की क्षमता विकसित करती है। आधुनिक मनोविज्ञान में विपश्यना को माइंडफुलनेस आधारित प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जो आत्म-जागरूकता, भावनात्मक नियंत्रण और मनोवैज्ञानिक कल्याण को बढ़ावा देती है।

प्रस्तुत सैद्धांतिक लेख में विपश्यना साधना और भावनात्मक समायोजन के बीच संबंध का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। इसमें यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि विपश्यना किस प्रकार व्यक्ति की भावनात्मक स्थिरता, तनाव सहनशीलता, आत्म-नियंत्रण और सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण के विकास में योगदान देती है।

शब्द कुंजी-विपश्यना साधना, भावनात्मक समायोजन, माइंडफुलनेस, भावनात्मक विनियमन, मानसिक स्वास्थ्य, आत्म-जागरूकता।