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July to September 2026 Article ID: NSS9942 Impact Factor:8.05 Cite Score:7 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन दर्शन: एक अध्ययन
विरेन्द्र मुवेल
सहायक प्राध्यापक (वाणिज्य) वी.बी.के.एन.शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सेंधवा, जिला बडवानी (म.प्र.)
शोध सारांश- भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम एवं समृद्ध ज्ञान
परंपराओं में से एक है। यह केवल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि
दर्शन, शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य, कला, संस्कृति, नैतिकता तथा पर्यावरण संरक्षण
जैसे विविध क्षेत्रों को समाहित करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य मनुष्य
के सर्वांगीण विकास, आत्मबोध, नैतिक चेतना एवं लोककल्याण की भावना का विकास करना है।
भारतीय ज्ञान परंपरा के निर्माण एवं विकास में वैदिक, बौद्ध और जैन परंपराओं का विशेष
योगदान रहा है। इनमें जैन दर्शन ने अहिंसा, अनेकांतवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह, सत्य
तथा आत्मसंयम जैसे सिद्धांतों के माध्यम से भारतीय चिंतन को नई दिशा प्रदान की। भगवान
महावीर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी वैश्विक शांति, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक
समरसता, नैतिक नेतृत्व तथा सतत विकास के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं।
प्रस्तुत
शोध-पत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा की अवधारणा, जैन दर्शन के उद्भव, उसके प्रमुख सिद्धांतों
तथा भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन दर्शन में अंतर्संबंध का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया
गया है। यह अध्ययन दर्शाता है कि जैन दर्शन भारतीय ज्ञान प्रणाली का अभिन्न अंग है,
जो आज भी मानवता को नैतिक एवं व्यावहारिक जीवन के लिए प्रेरित करता है।
शब्द कुंजी-भारतीय ज्ञान परंपरा, जैन
दर्शन, अहिंसा, अनेकांतवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह, भगवान महावीर, भारतीय ज्ञान प्रणाली।
