• July to September 2026 Article ID: NSS9952 Impact Factor:8.05 Cite Score:23 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    राजस्थान में लकुलीश की मूर्तियाँ : पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर एक पुनर्मूल्यांकन

      ललित धाकड़
        शोधार्थी, इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राज.)

शोध सारांश- लकुलीश का शैव मत के धार्मिक और कला इतिहास में एक विशेष स्थान है। पाशुपत संप्रदाय के प्रमुख आचार्य के रूप में वे समय के साथ एक धार्मिक गुरु से शिव के एक महत्त्वपूर्ण अवतार के रूप में पूजे जाने लगे। राजस्थान लकुलीश की प्रतिमाओं के अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है, क्योंकि इस क्षेत्र मे उपलब्ध पुरातात्त्विक साक्ष्य, मंदिर स्थापत्य, अभिलेख और मूर्तियाँ सामूहिक रूप से पूर्व मध्यकाल से लकुलीश-पाशुपत संप्रदाय की उपस्थिति को पुख्ता करते हैं। राजस्थान की लकुलीश प्रतिमाओं पर सामान्यतः या तो शैव धर्म के व्यापक इतिहास के अंतर्गत चर्चा की गई है अथवा यहा के मंदिरों के संदर्भ में लिखते समय इनका वर्णन हुआ है। ऐसे मे इस क्षेत्र मे एक राजस्थान केंद्रित व्यापक पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता महसूस होती है।           

    प्रस्तुत शोध-पत्र राजस्थान में लकुलीश की मूर्तिकला का अध्ययन पुरातात्त्विक स्त्रोतों, मंदिर स्थापत्य, अभिलेखीय साक्ष्य और कला-ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर करता है। इस दौरान विशेष ध्यान मेवाड़ के एकलिंगजी, नागदा, झालरापाटन, सीकर के हर्षनाथ, मेनाल, चित्तौड़गढ़ तथा हाड़ौती क्षेत्र के साक्ष्यों पर दिया गया है। अध्ययन में लकुलीश के विभिन्न रूपों की प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण किया गया है। जिनमें मुख्य रूप से बेठी मुद्रा, खड़ी मुद्रा, ऊर्ध्वमेद्र मुद्रा, योगिक मुद्रा, तपस्वी मुद्रा तथा स्थापत्य में अंकित अन्य स्वरूप एवं उनकी विशेषताए सम्मिलित हैं।     

शब्द कुंजी-लकुलीश, लकुलीश पाशुपत, शैव धर्म, राजस्थान, हर्षनाथ, झालरापाटन, मेनाल,एकलिंगजी, मंदिर मूर्तिकला।