• July to September 2026 Article ID: NSS9970 Impact Factor:8.05 Cite Score:12 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf

    भारतीय ज्ञान प्रणाली में संघवाद विकेन्द्रीकृत शासन की परम्परा ऐतिहासिक निरन्तरता तथा चुनौतियाँ

      अम्बिका गुप्ता
        शोधार्थी, राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन अध्ययनशाला, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)

शोध सारांश- भारतीय शासन-विचार को केवल औपनिवेशिक संस्थाओं अथवा पश्चिमी राजनीतिक प्रतिमानों की नकल के रूप में समझना ऐतिहासिक और वैचारिक रूप से अधूरा है। भारतीय ज्ञान-प्रणाली में धर्म, लोकाचार, कर्तव्य, समुदाय, सहमति, बहुलता और स्थानीय उत्तरदायित्व जैसे विचार विभिन्न धार्मिक, दार्शनिक, विधिक तथा सामाजिक परम्पराओं में विकसित हुए। इन परम्पराओं ने आधुनिक अर्थों में लोकतंत्र या संघवाद का कोई एकसमान, संवैधानिक मॉडल प्रस्तुत नहीं किया, फिर भी उन्होंने सत्ता को सामाजिक जीवन से जोड़ने, स्थानीय समुदायों को भूमिका देने और विविधता के भीतर व्यवस्था बनाए रखने के विचारों को पोषित किया। आधुनिक भारत में इन ऐतिहासिक संसाधनों का पुनर्संयोजन संविधान, पंचायती राज, ग्राम सभा और संघीय संस्थाओं के माध्यम से हुआ।

    यह शोध-पत्र भारतीय ज्ञान-प्रणाली, विकेन्द्रीकरण और संघवाद के बीच सम्बन्ध का आलोचनात्मक अध्ययन करता है। इसका तर्क है कि भारतीय अनुभव में विकेन्द्रीकरण केवल प्रशासनिक अधिकारों का नीचे हस्तांतरण नहीं, बल्कि स्थानीय समाज, राज्य और नागरिक के बीच वैधता का पुनर्गठन है। संविधान का अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाइयों के रूप में विकसित करने का निर्देश देता है, जबकि 73वें संविधान संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक आधार दिया। फिर भी वास्तविक सशक्तीकरण राज्यों में असमान है। अनेक स्थानों पर कार्य, वित्त और कर्मचारी पर्याप्त रूप से हस्तांतरित नहीं हुए ग्राम सभाओं में भागीदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व भी कमजोर रहे। संघवाद के स्तर पर भारत ने विविधता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाया, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक केन्द्रीकरण ने सहकारी संघवाद की सीमाएँ स्पष्ट की हैं।स्पष्ट है भारतीय ज्ञान-प्रणाली को गौरव-कथा या अतीत की सरल पुनरावृत्ति के रूप में नहीं, बल्कि बहुलता, संवाद, उत्तरदायित्व और स्थानीय ज्ञान की आलोचनात्मक परम्परा के रूप में पढ़ना चाहिए। भविष्य के लिए ग्राम सभा को वास्तविक निर्णयकारी अधिकार, स्थानीय वित्तीय स्वायत्तता, सामाजिक समावेशन, राज्यों की संघीय स्वायत्तता, क्षमता निर्माण और डिजिटल पारदर्शिता आवश्यक हैं।

शब्द कुंजी-भारतीय ज्ञान-प्रणाली, विकेन्द्रीकरण, पंचायती राज, ग्राम सभा, संघवाद, स्वशासन।