-
July to September 2026 Article ID: NSS9976 Impact Factor:8.05 Cite Score:43 Download: 0 DOI: https://doi.org/ View PDf
भाषा एवं लिपि - ज्ञान परम्परा का आधार
बीरेंद्र सिंह कुशवाह
सहायक प्राध्यापक (इतिहास) शास. महाविद्यालय, बदरवास, शिवपुरी (म.प्र.)
शोध सारांश- भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की
प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान-परम्पराओं में से एक है, जिसके
संरक्षण, संवर्धन और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण मेंभाषा एवं लिपि की
केंद्रीय भूमिकारही है। भाषा केवल विचारों, भावनाओं
एवं अनुभवों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि
यह किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, बौद्धिक
विरासत और सामूहिक चेतना को संरक्षित करने का प्रभावी साधन भी है। दूसरी ओर,
लिपि भाषा को स्थायित्व प्रदान करते हुए ज्ञान को लिखित एवं दस्तावेजीकृत
स्वरूप प्रदान करती है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में वैदिक मौखिक परम्परा से लेकर
पाण्डुलिपि-परम्परा और आधुनिक डिजिटल अभिलेखीकरण तक ज्ञान के संरक्षण और संप्रेषण
की प्रक्रिया में भाषा एवं लिपि निरंतर महत्वपूर्ण रही हैं। संस्कृत,
पालि, प्राकृत, तमिल तथा विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं ने भारतीय ज्ञान के
विविध आयामों को अभिव्यक्ति प्रदान की। इसी प्रकार ब्राह्मी,
खरोष्ठी, शारदा, ग्रन्थ, देवनागरी तथा अन्य लिपियों ने ज्ञान-साहित्य को लिखित रूप
में संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।प्रस्तुत शोध-पत्र में भाषा एवं
लिपि के ऐतिहासिक विकास, भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण एवं संप्रेषण में उनकी
भूमिका, मौखिक एवं लिखित परम्पराओं के अंतर्संबंध,
औपनिवेशिक काल में भाषाई एवं लिपिगत परिवर्तन तथा समकालीन समय में इनके
संरक्षण एवं पुनरोद्धार के प्रयासों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य
यह स्पष्ट करना है कि भाषा एवं लिपि केवल संप्रेषण के साधन नहीं,
बल्कि भारतीय सभ्यता की बौद्धिक निरंतरता, सांस्कृतिक
अस्मिता और सामूहिक स्मृति के आधारभूत तत्व हैं।
शब्द कुंजी-भाषा, लिपि, भारतीय ज्ञान परम्परा, सांस्कृतिक विरासत,पाण्डुलिपि, ज्ञान-संरक्षण।
