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July to September 2026 Article ID: NSS9982 Impact Factor:8.05 Cite Score:39 Download: 0 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9982 View PDf
भारतीय लोक एवं जनजातीय कलाओं का अंतर्राष्ट्रीय फैशन में अनुप्रयोग: स्थानीय परंपरा, वैश्विक नीतिगत ढांचा और आर्थिक सशक्तिकरण का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
अर्चना गर्ग
असिस्टेंट प्रोफेसर (चित्रकला) स्वामी शुकदेवानंद विश्वविद्यालय, शाहजहांपुर (उ.प्र.)
शोध सारांश- भारतीय लोककलाएँ भारत की बहुलतापूर्ण सांस्कृतिक
संरचना, सामाजिक स्मृति, धार्मिक विश्वासों, सामुदायिक जीवन और स्थानीय
ज्ञान-परंपराओं की दृश्य अभिव्यक्ति हैं। मधुबनी, वारली, गोंड, पिथोरा, पट्टचित्र, कलमकारी, ऐपन, मंजूषा अन्य
लोक एवं जनजातीय कला-परंपराएँ लंबे समय तक स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों
में विकसित होती रही हैं। इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण, डिजिटल तकनीक, फैशन उद्योग, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया, अंतरराष्ट्रीय
प्रदर्शनियों और डिजाइन शिक्षा ने इन कला-परंपराओं को स्थानीय सीमाओं से बाहर
पहुँचाने के नए अवसर उत्पन्न किए हैं।
वर्तमान शोध-पत्र का उद्देश्य समकालीन अंतरराष्ट्रीय फैशन
और टेक्सटाइल में भारतीय लोककलाओं के प्रभाव का आलोचनात्मक अध्ययन करना है। शोध
में विशेष रूप से यह समझने का प्रयास किया गया है कि पारंपरिक लोक कला-मोटिफ
आधुनिक परिधान, प्रिंट, सतह-सज्जा, होम टेक्सटाइल, एक्सेसरी, ब्रांडिंग, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया में किस प्रकार
पुनर्व्याख्यायित हो रहे हैं। अध्ययन यह भी विश्लेषित करता है कि लोककला का
वैश्विक बाजार में प्रवेश केवल सौंदर्यात्मक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह
सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक अवसर, महिला सशक्तिकरण, शिल्पकार आजीविका, सतत फैशन और सांस्कृतिक कूटनीति से भी जुड़ा हुआ है।
शोध मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों, आधिकारिक दस्तावेजों, अकादमिक लेखों, भारत सरकार
के हस्तशिल्प संबंधी स्रोतों और समकालीन डिजाइन-संबंधी अध्ययनों पर आधारित है।
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारतीय लोककलाएँ आधुनिक डिजाइन में केवल सजावटी
पैटर्न के रूप में प्रयुक्त नहीं हो रही हैं, बल्कि वे कथा, पहचान, स्थान, समुदाय और
सांस्कृतिक स्मृति के वाहक के रूप में भी कार्य कर सकती हैं। दूसरी ओर, वैश्विक फैशन
बाजार में इनके उपयोग के साथ सांस्कृतिक appropriation, कलाकारों को
उचित श्रेय न मिलना, आर्थिक असमानता, प्रतीकों का संदर्भ-विहीन प्रयोग, मशीन-निर्मित नकल और बौद्धिक
संपदा संरक्षण जैसी चुनौतियाँ भी सामने आती हैं।
अतः भारतीय लोककलाओं का अंतरराष्ट्रीय विस्तार तभी
सांस्कृतिक रूप से सार्थक माना जा सकता है जब आधुनिक डिजाइन नवाचार के साथ
कलाकारों और समुदायों की भागीदारी, उचित पारिश्रमिक, श्रेय, भौगोलिक संकेतक, दस्तावेजीकरण और सांस्कृतिक संदर्भ की रक्षा सुनिश्चित की
जाए।
शब्द कुंजी-भारतीय लोककला, जनजातीय कला, समकालीन फैशन, टेक्सटाइल डिजाइन, डिजिटल मीडिया, सांस्कृतिक विरासत, वैश्वीकरण, सतत फैशन, मधुबनी, वारली, गोंड।
