• July to September 2026 Article ID: NSS9997 Impact Factor:8.05 Cite Score:28 Download: 0 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9997 View PDf

    भारत में लैंगिक समानता एवं न्याय की दिशा में सामाजिक और राजनीतिक प्रयास : महिला आंदोलन, महिला संगठन, सशक्तीकरण एवं राजनीतिक भागीदारी का विश्लेषणात्मक अध्ययन

      सोनू कुमार
        शोधार्थी ( राजनीति विज्ञान) जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (सारण) (बिहार)

शोध सारांश-  भारत में लैंगिक समानता एवं लैंगिक न्याय की स्थापना केवल संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय तक चले सामाजिक सुधार आंदोलनों, महिला आंदोलनों, महिला संगठनों, शिक्षा के प्रसार, सामाजिक जागरूकता तथा राजनीतिक संघर्षों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति ऐतिहासिक रूप से अनेक प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असमानताओं से प्रभावित रही। ऐसी परिस्थितियों में उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलनों ने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह, सती-प्रथा तथा महिलाओं की सामाजिक स्थिति से जुड़े प्रश्नों को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया। सावित्रीबाई फुले, ज्योतिराव फुले, पंडिता रमाबाई, ईश्वरचंद्र विद्यासागर तथा अन्य सुधारकों के प्रयासों ने महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक अधिकारों के प्रश्न को नई दिशा दी।

बीसवीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने महिलाओं की राजनीतिक चेतना और सार्वजनिक भागीदारी को व्यापक बनाया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि महिलाएँ केवल सामाजिक सुधार की लाभार्थी नहीं, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन की सक्रिय भागीदार भी हैं। कस्तूरबा गांधी सहित अनेक महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। NCERT की सामग्री में कस्तूरबा गांधी की शिक्षा, स्वच्छता, खादी, विदेशी वस्त्र और शराब की दुकानों के बहिष्कार तथा स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का उल्लेख मिलता है।¹

स्वतंत्रता के बाद महिला आंदोलनों का स्वरूप भी परिवर्तित हुआ। संवैधानिक समानता प्राप्त होने के बावजूद महिलाओं के सामने घरेलू हिंसा, दहेज, यौन उत्पीड़न, आर्थिक निर्भरता, संपत्ति में अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय-प्रक्रिया में सीमित भागीदारी जैसी समस्याएँ बनी रहीं। परिणामस्वरूप महिला संगठनों और सामाजिक आंदोलनों ने इन मुद्दों को सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। स्वतंत्र भारत में महिला सशक्तीकरण को आगे बढ़ाने के लिए राज्य और नागरिक समाज दोनों स्तरों पर संस्थागत प्रयास विकसित हुए। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय अपने मिशन में महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण, लैंगिक सरोकारों के मुख्यधाराकरण तथा महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता को महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में रेखांकित करता है।²

इस शोध-पत्र का उद्देश्य भारत में लैंगिक समानता एवं लैंगिक न्याय की दिशा में हुए सामाजिक और राजनीतिक प्रयासों का विश्लेषण करना है। अध्ययन विशेष रूप से महिला आंदोलन, महिला संगठनों, शिक्षा और जागरूकता, राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका, स्वतंत्र भारत के महिला आंदोलनों, महिला सशक्तीकरण तथा स्थानीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर केंद्रित है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि लैंगिक न्याय की प्रक्रिया में कानून और राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ सामाजिक आंदोलनों और महिलाओं की स्वयं की राजनीतिक सक्रियता भी निर्णायक महत्व रखती है।

शब्द कुंजी-लैंगिक समानता, लैंगिक न्याय, महिला आंदोलन, महिला संगठन, महिला सशक्तीकरण, राजनीतिक भागीदारी, महिला नेतृत्व, सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण।